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गर्भवती की जिंदगी पर मौत के हस्ताक्षर! उत्तराखंड की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था का खौफनाक चेहरा

SattaSamvad by SattaSamvad
January 10, 2026
in उत्तरकाशी, उत्तराखंड, स्वास्थ्य
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गर्भवती की जिंदगी पर मौत के हस्ताक्षर! उत्तराखंड की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था का खौफनाक चेहरा
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अस्पताल में इलाज से पहले ‘मौत की सहमति’ क्यों? क्या पहाड़ में सुरक्षित प्रसव अब भी सपना है?

उत्तरकाशी/नौगांव : उत्तराखंड की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की तस्वीरें आप पहले भी देखते रहे हैं, लेकिन आज जो मामला सामने आया है, वह न सिर्फ सिस्टम को कटघरे में खड़ा करता है बल्कि इंसानियत को भी झकझोर देता है।

मामला उत्तरकाशी जनपद के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र नौगांव का है, जहां एक स्थानीय व्यक्ति जब अपनी गर्भवती पत्नी को लेकर अस्पताल पहुंचा, तो इलाज से पहले उससे एक ऐसा पत्र लिखवाया गया जिसे पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

इस पत्र में साफ लिखा गया कि अस्पताल में कोई विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं है, न ब्लड बैंक की सुविधा है और न ही ऑपरेशन की व्यवस्था। गर्भवती महिला के प्रसव के दौरान होने वाले तमाम खतरों, यहां तक कि मां और बच्चे की मौत की संभावना से परिजन को अवगत कराया गया और इसके बावजूद सीमित संसाधनों में प्रसव कराने की सहमति लिखवाई गई।

इतना ही नहीं, पत्र में यह भी दर्ज कराया गया कि किसी भी अप्रिय घटना के लिए अस्पताल प्रबंधन या कर्मचारी जिम्मेदार नहीं होंगे, बल्कि सारी जिम्मेदारी परिजन की होगी।

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मजबूरी या मजबूर किया जाना?

अस्पताल प्रबंधन द्वारा ऐसा पत्र लिखवाया जाना न सिर्फ पहाड़ के गरीब और लाचार लोगों के साथ क्रूर मजाक है, बल्कि यह सिस्टम की जिम्मेदारियों से खुली बचने की कोशिश भी दिखाता है। सवाल यह भी है कि जब सुविधाएं नहीं हैं, तो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र केवल नाम के लिए क्यों?

एक अस्पताल नहीं, पूरे पहाड़ की कहानी

सत्ता संवाद के हाथ लगे इस पत्र ने स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है। यह तस्वीर केवल नौगांव सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की नहीं है, बल्कि पहाड़ के लगभग हर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की हकीकत बयां करती है।

कुछ दिन पहले कुमाऊं मंडल के चौखुटिया सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को लेकर स्थानीय लोगों का आक्रोश सड़क पर दिखा। लोग चौखुटिया से पैदल देहरादून तक पहुंचे, लेकिन इसके बावजूद पहाड़ की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था में कोई ठोस सुधार नजर नहीं आया।

26 साल में भी नहीं सुधरा सिस्टम

उत्तराखंड बने 26 साल हो चुके हैं। इस दौरान कई स्वास्थ्य मंत्री आए और गए, लेकिन पहाड़ की स्वास्थ्य व्यवस्था आज भी रेफर सिस्टम बनकर रह गई है। सीमांत जनपद ही नहीं, बल्कि राजधानी के आसपास के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की हालत भी कुछ अलग नहीं है।

कई बार इन केंद्रों में गर्भवती महिलाओं की मौत के आंकड़े डराने वाले रहे हैं, लेकिन जिम्मेदारी तय करने की बजाय सिस्टम चुप्पी साध लेता है।

सिस्टम से सत्ता संवाद के सवाल।

  • क्या पहाड़ में गर्भवती महिलाओं की जान की कोई कीमत नहीं?
  • इलाज से पहले मौत की सहमति लिखवाना क्या कानूनन और नैतिक रूप से सही है?
  • जब सुविधाएं नहीं हैं तो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र किस काम के?
  • आखिर कब तक पहाड़ की महिलाएं रेफर सिस्टम के भरोसे जिंदगी और मौत से जूझती रहेंगी?
  • 26 साल बाद भी उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था पटरी पर क्यों नहीं आ पाई?

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Tags: Cm pushkar Singh DhamiHarish rawatKhabar UttrakhandSatta samvadनौगांव सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रबदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था
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