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करोड़ों खर्च होने के बाद भी बेअसर देहरादून स्मार्ट सिटी परियोजना, CAG रिपोर्ट ने उठाए सवाल !

Dehradun News : देहरादून में चल रहे स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के कामों को लेकर CAG की रिपोर्ट में कई गंभीर खामियां सामने आई हैं। जिसे लेकर अब प्रदेश में राजनीति तेज हो चली है।

कैग रिपोर्ट में देहरादून स्मार्ट सिटी परियोजना को लेकर उठे सवाल

विधानसभा के बजट सत्र में कैग रिपोर्ट पेश की गई। इस रिपोर्ट में देहरादून की स्मार्ट सिटी परियोजना को कई सवाल उठाए गए हैं। आपको बता दें कि स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत देहरादून का चयन जून 2017 में किया गया था और उत्तराखंड से इस प्रोजेक्ट में शामिल होने वाला ये एकमात्र शहर है ।

देहरादून के लिए इस प्रोजेक्ट के तहत करीब 1000 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए थे । 17 से 23 के बीच इसमें से 737 करोड़ रुपये जारी किए गए, लेकिन मात्र 634 करोड़ रुपये ही खर्च किए जा सके, जिससे स्पष्ट है कि स्वीकृत राशि का पूरा उपयोग नहीं हो पाया।

योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल

कैग की इस रिपोर्ट में वर्ष 2018 से 2023 के बीच लागू की गई 22 परियोजनाओं का मूल्यांकन किया गया, जिसमें अधिकांश योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल उठाए गए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक दून इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर के तहत ई-गवर्नेंस समाधान में शामिल बायोमेट्रिक और सेंसर आधारित सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट मॉड्यूल प्रभावी रूप से काम नहीं कर पाया, जिससे लगभग 4.5 करोड़ रुपये बेकार चले गए। वहीं स्मार्ट अपशिष्ट वाहन परियोजना के तहत नब्बे लाख से खरीदे गए ई-रिक्शा भी उपयोग में नहीं लाए गए।

इसके अलावा स्मार्ट स्कूल परियोजना भी सफल नहीं हो पाई । देहरादून के तीन सरकारी स्कूलों में लगाए गए इंटरैक्टिव बोर्ड, कंप्यूटर लैब, प्रोजेक्टर और सीसीटीवी बिजली बिल के खर्च के कारण निष्क्रिय पड़े रहे, क्योंकि स्कूल इस खर्च को वहन नहीं कर सके ।

परियोजनाओं में अधूरे कार्यों के बावजूद पूरा भुगतान

रिपोर्ट में ये भी सामने आया कि पर्यावरण सेंसरों पर खर्च किए गए दो करोड़ 62 लाख रुपये और मल्टी यूटिलिटी डक्ट पर 3 करोड़ 24 रुपये का खर्च भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाया । कुछ परियोजनाओं में अधूरे कार्यों के बावजूद पूरा भुगतान किए जाने की बात भी सामने आई है, जिससे 5 करोड़ रुपये से अधिक की अनियमितताएं पाई गईं ।

यही नहीं देहरादून स्मार्ट सिटी लिमिटेड कार्यदायी संस्था से 19 करोड़ रुपए की वो राशि भी वसूलने में विफल रही, जिसका उपयोग नहीं हुआ था। वित्तीय कुप्रबंधन के कारण स्मार्ट सिटी परियोजना को करीब 6 करोड़ रुपये के ब्याज का भी नुकसान उठाना पड़ा।

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