उत्तरकाशी। पहाड़ी क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में पाए जाने वाले चीड़ के पेड़ हर साल जंगलों में आग का बड़ा कारण बनते हैं। इनकी सूखी पत्तियों (पिरूल) से हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र जलकर खाक हो जाता है और पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचता है। लेकिन अब यही पत्तियां वरदान साबित हो रही हैं और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का नया साधन बन गई हैं।
प्रदूषण रहित कोयला, बढ़ रही डिमांड
उत्तरकाशी में चीड़ की पत्तियों से प्रदूषण-रहित कोयला तैयार किया जा रहा है। कोयले की कीमत प्रति किलो 16 रुपए है। यह कोयला धुआं-रहित चूल्हों में उपयोग किया जाता है, जिसकी बाजार में लगातार मांग बढ़ रही है।
इसकी सबसे खास बात यह है कि एक समय का खाना बनाने की कुल लागत केवल 8 रुपये आती है। धुआं-रहित होने के कारण यह महंगे एलपीजी सिलेंडर और लकड़ी आधारित रसोई का एक सस्ता, सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प बनकर उभरा है।

एक महीने में हजार से अधिक खरीदार!
स्थानीय बाजार में इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि केवल एक महीने में 1000 से अधिक लोगों ने यह चूल्हे और कोयला खरीदा है। कई घरों, कैंप साइट्स और होम-स्टे में इसे गर्मी सेंकने के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है।
ग्रामीणों को मिला रोजगार, 10 रुपये किलो में बिक्री
जिन चीड़ की पत्तियों को अब तक जंगलों में आग का सबसे बड़ा कारण माना जाता था, वही अब ग्रामीणों के लिए आय का जरिया बन रही हैं। गांवों के लोग जंगलों से इन पत्तियों को एकत्र कर 10 रुपये प्रति किलो की दर से प्रोसेसिंग प्लांट को बेच रहे हैं। इससे न केवल उनकी आमदनी बढ़ रही है, बल्कि जंगलों में आग लगने की घटनाएं भी कम होने लगी हैं।
पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम
चीड़ की पत्तियों से बने इस कोयले ने पर्वतीय क्षेत्रों में एक नई उम्मीद जगाई है। जंगलों में जहां आग की घटनाओं में कमी देखने को मिली है, वहीं ग्रामीणों को घर बैठे रोजगार मिल रहा है।जो सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा का विकल्प भी बन रहा है। चीड़ के कोयले से पर्यावरण भी संरक्षित हो रहा है। कहा जा सकता है कि, उत्तरकाशी में शुरू हुई यह पहल अब पूरे राज्य और देश के अन्य पर्वतीय हिस्सों के लिए भी एक मॉडल बन सकती है।










