देहरादून। (Buro Report) एक ओर उत्तराखंड में सरकारी ज़मीनों की सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े विज्ञापन और दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रेमनगर क्षेत्र में नए बाइपास के पास एक सरकारी भूमि पर कथित रूप से अवैध निर्माण ने प्राधिकरण की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि यह भूमि सरकारी है, लेकिन वर्षों पहले कथित कब्जे के आधार पर इसकी खरीद-फरोख्त हुई और अब दिल्ली–गुड़गांव से आए एक व्यक्ति द्वारा यहां पक्का निर्माण कराया जा रहा है।
प्राधिकरण के अधिकारी सवालों के घेरे में
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि मसूरी-देहरादून प्राधिकरण के उपाध्यक्ष और अफसरों के सामने यह निर्माण खुलेआम जारी है, जिससे अधिकारियों की भूमिका पर भी प्रश्न उठ रहे हैं। प्रेमनगर सर्कल के प्रभारी AE अभिषेक भारद्वाज से जब कार्रवाई का अपडेट जानने की कोशिश की गई तो उन्होंने अपने एक निचले कर्मचारी का नंबर देकर कहा कि “उन्हें जानकारी होगी।” इसके बाद उन्होंने और कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया।

निर्माण कराने वालों की ओर से भी नहीं मिला जवाब
वेबसाइट संपादन टीम ने निर्माण करा रहे व्यक्ति से भी अनुमति और भूमि दस्तावेज़ों पर प्रतिक्रिया मांगी, लेकिन खबर तैयार होने तक उनकी ओर से कोई जवाब प्राप्त नहीं हो सका।
सूत्रों का दावा है कि निर्माण कराने वाला व्यक्ति किसी दूसरी भूमि के कागजात इस सरकारी भूमि पर दिखाकर कब्ज़े की तैयारी में है!
पहले भी विवादों में रहे AE अभिषेक भारद्वाज
स्थानीय लोग आरोप लगाते हैं कि अधिकारी अभिषेक भारद्वाज पहले भी मसूरी में तैनाती के दौरान विवादों में रहे थे और शिकायतों के बाद उनका तबादला किया गया था। अब फिर उनकी कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है। प्राधिकरण द्वारा दिए जाने वाले चालान और तारीखों के हवाले को लेकर भी स्थानीय जनता खासी नाराज है, उनका कहना है कि चालान की आड़ में आधा देहरादून अवैध निर्माणों भी भेंट चढ़ गया है।
सबसे अहम सवाल, अगर जमीन सरकारी है तो कार्रवाई क्यों नहीं?
स्थानीयों का प्रमुख सवाल यही है कि यदि भूमि वास्तव में सरकारी है, तो फिर अब तक निर्माण को रोका, सील किया या ध्वस्त क्यों नहीं किया गया? क्या यहां MDDA का धाकड़ बुलडोजर कमजोर पड़ गया है। यही सवाल प्राधिकरण की कार्यशैली और मंशा दोनों पर संदेह खड़ा कर रहा है।
उच्च स्तर की जांच की मांग
स्थानीय निवासियों का कहना है कि सरकारी भूमि की सुरक्षा के नाम पर प्रचार किया जा रहा है, लेकिन ज़मीन पर सच कुछ और ही दिखाई देता है। कई नागरिकों ने मांग की है कि ऐसे मामलों की उच्च-स्तरीय जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए।










