देहरादून: (संपादकीय) उत्तराखंड एक बार फिर प्राकृतिक आपदा की चपेट में है। भारी वर्षा, भूस्खलन, बादल फटने और नदियों के उफान ने जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। पहाड़ी क्षेत्रों में मकान जमींदोज हो गए हैं, सड़कें टूटी पड़ी हैं और सैकड़ों लोग बेघर हो गए हैं। कुछ लोगों ने अपनों को खो दिया है, तो कई अब भी लापता हैं। यह त्रासदी न केवल दुखद है, बल्कि एक बार फिर हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हम प्रकृति के साथ किस हद तक खिलवाड़ कर चुके हैं।

उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति इसे संवेदनशील बनाती है। यहां की पर्वतीय संरचना, नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव मिलकर स्थिति को और भी जटिल बना देते हैं। लेकिन इन प्राकृतिक जोखिमों को जानने के बावजूद जिस प्रकार से अंधाधुंध निर्माण, जंगलों की कटाई और पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी की जा रही है, वह हमारी सामूहिक लापरवाही को दर्शाता है।
सरकार और प्रशासन हर बार आपदा के बाद सक्रिय दिखते हैं। राहत और बचाव कार्य शुरू किए जाते हैं, मुआवजे की घोषणाएं होती हैं, लेकिन दीर्घकालिक समाधान पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। आपदा प्रबंधन केवल घटनाओं के बाद की प्रतिक्रिया नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह पूर्व तैयारी, सतर्कता और टिकाऊ विकास की रणनीति पर आधारित होना चाहिए।

उत्तराखंड की यह आपदा केवल एक राज्य का संकट नहीं है, यह पूरे देश के लिए एक चेतावनी है। जलवायु परिवर्तन का असर अब सैद्धांतिक नहीं रहा, यह अब प्रत्यक्ष और विनाशकारी रूप में सामने आ रहा है। हमें अपने विकास मॉडल पर पुनर्विचार करना होगा। ऐसा विकास जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाए, न कि उसे चुनौती दे।
अब समय आ गया है कि हम आपदा को केवल प्राकृतिक घटना मानकर पल्ला न झाड़ें, बल्कि अपने निर्णयों और नीतियों की समीक्षा करें। स्थायी विकास, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से योजना निर्माण और आमजन की सहभागिता ही उत्तराखंड जैसे राज्यों को सुरक्षित रख सकती है।
उत्तराखंड की आपदा हमें यह याद दिलाती है कि यदि हम अब भी नहीं जागे, तो प्रकृति हमें बार-बार इसी प्रकार चेतावनी देती रहेगी और हर बार कीमत कहीं अधिक होगी।










